जमशेदपुरिया सबसे बढ़िया


–90 के दशक वालो की नज़र में जमशेदपुर कल और आज– श्वेता मोदी

जमशेदपुर देश दुनिया के लोगों के लिए स्टील सिटी भर हो सकता है, लेकिन हमारे लिए ये हमारे बचपन से किशोरावस्था और युवावस्था को गढ़ने वाली जगह है। 90 के दशक से अबतक जो बदलाव हमने अपने शहर में देखा है, वो भी यक़ीनन कम दिलचस्प नहीं है। एक वक़्त था, जब डीवीसी लाइन होने की वजह से जाने कितने ही दिनों तक बत्ती गुल रहती थी, लेकिन आज ऐसा वक़्त आया है, हम इंतज़ार करते हैं बत्ती गुल होने का। ताकि फिर से घर के चौखट पर चौपाल लगे। हम बच्चे जो शायद सबकी नज़र में अब बच्चे ना रहे हैं, फिर से बचपन के दिनों में जी सकें। 90 के दशक के बच्चों की सबसे ज़्यादा यादें इन बातों ने ताज़ा कर दी होंगी। तो चलिए कुछ और यादों की बात करते हैं।

याद है, किस तरह गली में गुल्ली डंडा, कंचे, कित-कित, पकड़म पकड़ाई, ताला चाभी खेला करते थे? 90 के दशक में जुबली पार्क किसी भी परिवार के सबसे पसंदीदा जगहों में से एक हुआ करता था। ज़ू जाने की हमारी ज़िद ने ना जाने कितनी बार एक पारिवारिक मौज भरा दिन हमारी यादों को दिया है। लेकिन आज के फ़ास्ट फॉरवर्ड समय में, इंटरनेट और स्मार्ट फ़ोन की दुनिया ने मानो इन जगहों से हमारा नाता ही तोड़ दिया।

गर्मियों के मौसम में जितनी चहल-पहल बस्ती, मोहल्ले और घरों के छत पर हुआ करती थी, वो आज जमशेदपुर के लगभग हर कोने से गायब है। स्मार्ट फ़ोन का ना होने और एक दूसरे की बालकनी-छत से दोस्ती निभाना इस शहर की ख़ासियत रही थी। इसकी ख़ास वजह ये भी थी कि जमशेदपुर बिहार का हिस्सा हुआ करता था और दोस्ती-यारी निभाने में बिहारियों का कोई सानी नहीं।

आज जमशेदपुर झारखण्ड का हिस्सा ज़रूर है, लेकिन ना यहाँ के लोग बदले ना ही उनके रीति रिवाज़ और तौर-तरीके। जो बदली वो है, नब्बे के दशक के बच्चों की ज़िंदगी। याद करो, किस तरह बचपन में हमारा परिवार, पड़ोसियों के साथ डाला टेम्पो में बैठकर दुर्गा पूजा के मौके पर घूमने के लिए जाया करता था?

फिलहाल अपनी बाइक, कार और हमारे बड़े हो जाने से ये सब बदल गया। घर-घर में पहुंचे एसी ने आज हमें उस चाँद से दूर कर दिया, जिसे पूरा बचपन हम मामा कहकर बताया करते थे। अब तो, कब पूर्णिमा आई, कब अमावस इसके लिए भी हमें कैलेंडर देखने की ज़रूरत पड़ती है। क्योंकि हम उस शहर में जीते हुए भी उस ज़िंदगी से दूर हो चुके हैं!

जमशेदपुरिया जानते हैं कि ये शहर सिर्फ कारोबार के लिए नही जाना जाता, बल्कि जाना जाता है अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए। डिमना डैम के लिए, कदमा के गणेश पूजा मेले के लिए, बिष्टुपुर के रीगल ग्राउंड के लिए, साकची बाज़ार की रौनक के लिए, सोनारी के कालीबाड़ी के लिए, टेल्को की मक्खन सड़कों के लिए और तो और कोआपरेटिव कॉलेज के पास मौजूद उस पिरामिड के लिए जिसे बचपन में हम भी मंदिर समझा करते थे।

जमशेदपुरिया पूरी दुनिया में कहीं भी चला जाए, उसे खींच लाएगी काशीडीह दुर्गा पूजा पंडाल की यादें, आदित्यपुर से जुगसलाई को जाने वाली सड़कों पर मिली भीड़ की सौगातें, स्वर्णरेखा नदी में बड़े उत्साह से होने वाले छठ पर्व की बिसरी बातें, माता गोलपहाड़ी के मंदिर की वो खूबसूरत ऊँची यादें, जहाँ सबसे पहले पहुँचने के लिए हम सबने कभी ना कभी रेस लगाया था।

यादें बस घूमने-फिरने और मौज मस्ती की ही नहीं बल्कि लज़ीज़ व्यंजनों के भी हैं। केवट की लिट्टी से लेकर गणेश/गोपाल के डोसे के स्वाद को ढूंढते हुए,चाहो तो पूरा एनसीआर छान मारो, लेकिन उस स्वाद को कहीं ना पाओगे! जगह-जगह कुल्फी की भरमार मिलेगी, लेकिन रमेश की कुल्फी का स्वाद ना बिसर पाओगे। पूरे भारत में पानी-पूरी,गुपचुप और फुचके के नाम से मशहूर आगरा चाट-गणेश के गोलगप्पे का स्वाद, लिखकर देती हूँ कहीं ना पाओगे। माधुरी दीक्षित के जबर फैन मनोहर चाट के वैरायटी ऑफ़ चाट्स, हर जगह ढूंढते रह जाओगे!

तो कुल मिलाकर बात ये है कि यूँ तो इस शहर में काफी कुछ बदल गया, लेकिन जो ना बदला है ना बदलेगा, वो है इस शहर की ख़ूबसूरती, इसका अपनापन, यहाँ का ज़ायका और इस शहर के लिए अपना हर दिन बढ़ता प्यार।

लेखिका,

श्वेता मोदी

जमशेदपुरटेंमेंट

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