जमशेदपुर टॉकीज़ से पिजेपी सिनेमा तक का सफर


Written by Shweta Modi

नई नवेली बहु को देखने की जितनी कुलबुलाहट होती है, उतनी ही कुलबुलाहट जमशेदपुरियों को पीजेपी सिनेमा में फ़िल्म देखने की थी। हाल ही में सिनेपोलिस ने जमशेदपुर में अपना सफ़र शुरू किया। 6 स्क्रीन वाले इस मल्टीप्लेक्स का तोहफ़ा, शहर को दशकों के लम्बे इंतज़ार के बाद मिला है। यूँ तो 3 स्क्रीन वाला आईलेक्स मल्टीप्लेक्स साल 2011 से ही जमशेदपुर में मल्टीप्लेक्स की कमी को दूर कर रहा है, लेकिन हाईवे पर होने के कारण कई बार लोग इतनी दूर जाने से कतराते नज़र आए हैं।

जिन लोगों को रात का शो परिवार के साथ देखने की इच्छा रहती है, वो भी कई बार आईलेक्स के विकल्प को छोड़, सिंगल स्क्रीन थिएटर पायल सिनेमा का रुख़ करते नज़र आए हैं। बहरहाल इन सभी उलझनों और असमंजस को दूर कर दिया है, पीजेपी सिनेमा ने। इस मल्टीस्क्रीन सिनेमा थिएटर की ख़ासियत है कि ये शहर के चहलपहल वाले इलाके में मौजूद है। उसपर सेंटर में होने के कारण किसी भी शख्स को सिनेमा देखने के लिए अब बहुत ज़्यादा योजनाएं नहीं बनानी पड़ेगी।

ये तो हुई ताज़ा बातें, लेकिन कौन भूल सकता है वो पुराना जमशेदपुर और यहाँ के सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों की यादें! बंसत सिनेमा, करीम टॉकीज़, जमशेदपुर टॉकीज़, गौशाला टॉकीज़, सम्राट टॉकीज़, रीगल टॉकीज़, नटराज टॉकीज़ ये उन सिनेमाघरों के नाम है, जहाँ आज के जमशेदपुरवासियों ने ना जानें कितनी ही फिल्मों को देखा और उन कहानियों को बड़े करीब से महसूस किया है। हालांकि अब सिंगल स्क्रीन और इन सिनेमाघरों का प्रचलन भी लगभग ख़त्म सा हो गया है।

इस बारे में जब जमशेदपुर में जिंदगी का लम्बा वक़्त गुज़ार चुके लोगों से बात हुई, तो उन्होंने बेहद दिलचस्प बातें साझा की। 50 वर्षीय उषा जी ने बताया कि एक वक़्त था जब वो हर मंगलवार के दिन अपने पति के साथ सिनेमा देखने बंसत सिनेमा जाया करती थीं। उस वक़्त फ़िल्म और अभिनेताओं को लेकर लोगों में इतनी दीवानगी रहती थी कि एक फ़िल्म को कई बार तक देखने में भी लोग टालमटोल नहीं करते थे। अगर कोई हिट फ़िल्म आई है, तो वें खुद अपने पति के साथ उसी फ़िल्म को 2-3 बार सिनेमाघर में देख आया करती थी।

53 वर्षीय नरेश जी ने बताया कि जब वे फ़िल्म देखने सिनेमाघरों में जाया करते थे उस वक़्त टिकट की कीमत 20-30 रुपये हुआ करती थी। वो दौर था, जब दर्शक कहानियों से इतना ज़्यादा जुड़ाव महसूस करते थे कि अभिनेता की ख़ुशी में सीटी बजाते और उनके ग़मों को देख आंसू टपकाते। आज फिल्मों के साथ-साथ दर्शकों में भी ख़ासा बदलाव आया है। पहले कि फिल्मों में हर तरह के सीन को सीमित रखा जाता था, लेकिन आज मल्टीप्लेक्स के दौर में हर तरह की फ़िल्में आती हैं, लोग अपनी पसन्द के हिसाब से अलग-अलग फ़िल्में देख सकतें हैं।

सत्यनारायण जी ने अपने अनुभवों के पिटारे से कुछ ख़ास यादों की पोटली निकाली। उन्होंने बताया कि किस तरह वो अपने बचपन में दोस्तों के साथ घर पर बिना बताए करीम टॉकीज़ में फ़िल्म देखने जाते थे। वो कहते हैं, पहले घर पर फ़िल्म देखने जाना बहुत बड़ी बात होती थी, अब तो ये आम बात है। 30-35 साल पहले परिवार में ऐसा माहौल नहीं हुआ करता था कि घर पर खुलकर फ़िल्म जाने की इच्छा को जताया जा सके, ना ही पूरा परिवार साथ फ़िल्म देखने जाता था।

ये तो थी उस वक़्त की बातें जब जमशेदपुर में ना मल्टीप्लेक्स हुआ करते थे, ना ही घरवालों के साथ फ़िल्म देखने जाने का प्रचलन था। ये वो दौर था, जब बड़े पर्दे पर फ़िल्में आया करती थीं और महीनों लगी रहती थीं। किस फ़िल्म को कितने स्टार मिले, इसका फैसला जनता-जनार्दन अपने उत्साह से करती थी। फ़िल्मी सितारों के प्रति दीवानगी का आलम ये था कि लोग फर्स्ट डे, फर्स्ट शो देखने के लिए मारपीट तक कर लेते थे। अब अगर आईलेक्स या पायल में फर्स्ट डे, फर्स्ट शो का क्रेज़ देखने को मिलता भी है, तो सलमान ख़ान स्टार्टर या एवेंजर्स/बाहुबली जैसी बड़ी फिल्मों के लिए। दो दशक पहले तक बसंत सिनेमा के अंदर न चिप्स-पॉपकॉर्न ले जाने की मनाही थी, न ही पायल सिनेमा में बैग रखने के लिए बैगेज काउंटर हुआ करते थे।

आलम ये कि अगर आपके जेब में 65-70 रुपये हैं, तो जमशेदपुर के किसी भी सिनेमाघर में दो लोगों के फ़िल्म देखने और चाय-समोसा का इंतज़ाम बड़े आराम से हो जाया करता था। उस दौर में रीगल सिनेमा हॉल में कितनी सीट खाली है और कार्नर वाली सीट मिलेगी भी या नहीं, इस बात से पर्दा भी, पर्दाघर के बाहर ही उठ पाता था। क्योंकि उस दौर में ना ऑनलाइन टिकट बुकिंग का विकल्प था, ना ही दिन पहले अपनी सीट बुक करा सकते थे। मौजूदा समय में लोग पायल, आईलेक्स और अब पीजेपी के रिव्यु और तस्वीरों को देखकर ही तय करते है कि मूवी देखने कहाँ जाना है। लेकिन 25 साल पहले ना स्मार्ट फ़ोन थे, ना ही लोगों को फ़िल्म का ट्रेलर, टीज़र देखने का मौका मिल पाता था। जबतक फ़िल्म नटराज-जीटी टॉकीज़ में लगी रहती थी,तबतक लोगों का हुज़ूम सिनेमाघर के बाहर देखने को मिलता था। बदलते समय के साथ अपना जैमपॉट भी बदल रहा है। अब पहले के सभी सिंगल स्क्रीन थिएटर या तो बंद हो चुके हैं, या उन्हें मल्टीस्क्रीन थिएटर में बदलने की कवायद तेज़ हो चली है। जिसका ताज़ा उदाहरण है, पीजेपी मल्टीस्क्रीन थिएटर की शुरुआत।

इस आर्टिकल में आपने जाना 25 से 30 साल पहले कैसा था जमशेदपुर में सिनेमा घरों का हाल। इसे पढ़कर अगर आपको भी सिनेमा हॉल से जुड़ी कोई ख़ास बात याद आ गई, तो हमें कमेंट कर ज़रूर बताएं।

Written by Shweta Modi

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