खतरे की घंटी क्या हम तैयार हैं, अपने “जमशेदपुर” से पलायन के लिए ?


जमशेदपुर: भारत में अपने स्टील प्लांट के लिए ख़ासा मशहूर है, लेकिन हाल ही में जमशेदपुर के निवासी भी सुर्ख़ियों में रहे हैं। जी हाँ, हैरानी की बात ये है कि शहर के दो-चार-दस लोग नहीं, बल्कि पूरे शहरवासी चर्चा में रहे हैं। ये चर्चा हम जमशेदपुरियों को शर्म से पानी-पानी कर रही है। दरअसल ये मसला भी पानी का ही है। हमारे शहरवासी पानी की बर्बादी को लेकर अख़बार, टीवी चैनल और सोशल मीडिया पर सुर्खियां बटोर रहे हैं।

इस शहर के ज़्यादातर इलाकें कंपनी एरिया में आते हैं, जहाँ जुस्को द्वारा पानी और बिजली की आपूर्ति की जाती है। हालांकि इसके लिए लोग शुल्क भरते हैं, लेकिन पैसे भरने से लोगों को कोई परेशानी नहीं है। 24 घंटे बिजली-पानी की सुविधा के सामने ये चन्द रुपये कुछ ख़ास मायने नहीं रखते। उसपर भी नल से पानी इतना स्वच्छ आता है कि उसे बिना फ़िल्टर किए ही पिया जा सकता है। इतने साफ़ पानी के लिए हमें ढेले भर पैसे देने पड़ते हैं, इसलिए पानी के लिए पैसे देना हमें किसी भी लिहाज़ से नहीं खलता।

जमशेदपुर के आसपास के इलाकों में पानी की चाहे जितनी दिक्कत हो, लेकिन जुस्को की मेहरबानी है कि कंपनी एरिया में हमें कभी जल संकट से नहीं जूझना पड़ा। शायद इसलिए जलस्तर का लगातार नीचे जाना, स्वर्णरेखा-खरखाईं नदी में जल का दूषित होना, आसपास के क्षेत्र में पानी की कमी होना, हमें कभी परेशान नहीं करता। लेकिन हमारी ये बेफिक्री ही हमारी सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही हैं। जमशेदपुर के कंपनी एरिया में रहने वाले लोग अगर नॉन-कंपनी एरिया या आसपास के ग्रामीण इलाकों में या फिर प्रदेश की राजधानी रांची में ही जल संकट कि स्थिति देखेंगे, तो दांतों तले ऊँगली चबाने को मजबूर हो जाएंगे।

अखबार लगभग हम सभी के घरों में आता है। जिनमें आय दिन हम पढ़ते हैं कि फलाना गांव एक भी हैण्डपंप काम नहीं कर रहा है, लोग 4-5 किलोमीटर दूर जाकर पानी लाते हैं। कहीं पढ़ने को आता है कि नल से गन्दा पानी आ रहा है और लोग उसे ही पीने को मजबूर है। कहीं पीने वाले सप्लाई वाटर में सांप,छिपकली तो कीड़े-मकौड़े निकलने की खबर भी अकसर हमारे कानों में पड़ती रहती है। इन ख़बरों को पढ़कर भी हम अपने आप को खुशकिस्मत नहीं मानते कि हमें फिल्टर किया हुआ पानी पीने को मिलता है। इतना ही नहीं, बल्कि जो सप्लाई का पीने वाला फ़िल्टर वाटर हमारे घरों में आता है, हम उसका इस्तेमाल नहाने/कपड़े-बर्तन धुलने में भी करते हैं।

लेकिन पानी को लेकर ऐसी किस्मत बस जमशेदपुर के कंपनी एरिया में ही देखने को मिलती है। लेकिन इस सुख के पीछे की सच्चाई हम सभी के पैरों के नीचे से ज़मीन खींच लेगी। अपने शहर में जल संकट कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है, इस बात का पता आप उस रिपोर्ट से लगा लें, जिसमें जमशेदपुर का नाम उन शहरों की फेहरिस्त में शामिल हो चला है, जिनमें आने वाले 12-13 सालों में पीने का पानी तक, नहीं बचेगा। ये रिपोर्ट किसी और की नहीं बल्कि डब्लूएचओ की है।

अपने शहर को लेकर ऐसी भयावह रिपोर्ट्स पढ़कर भी हमपर कुछ ख़ास असर नहीं होता। अब भी, हम अपने घर का नल खुला छोड़ देते है, पानी भर जाने के बाद भी घंटो तक टंकी से पानी बहाने के हम आदि हो चुके हैं। गाड़ी धुलने के लिए हम पाइप का इस्तेमाल नहीं करते बल्कि 1-1 टायर पर दो से तीन बाल्टी पानी उड़ेल देते हैं। अगर घर के किसी नल से पानी रिसता हो, तो हम प्लम्बर को तबतक नहीं बुलाते जबतक उस बहते पानी से हमारा घर गन्दा नहीं होता। बारिश के पानी को बचाना तो दूर, हम घर धुलने के नाम पर बेफ़िज़ूल में सैकड़ों लीटर पानी बहा देते हैं।

जमशेदपुर में पानी को लेकर जो आंकड़े हाल-फिलहाल में पेश किए गए हैं, उसे अगर हमने आख़िरी चुनौती के तौर पर नहीं लिया, तो कम से कम अंजाम भुगतान की तैयारी तो हमें कर ही लेनी चाहिए। अगर हमने पानी की बचत करने को लेकर कदम आज, अभी, इसी पल से शुरू नहीं किया, तो हमें अपने सुरक्षित भविष्य के लिए अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा बचाना होगा। ये हिस्सा कितना होना चाहिए इसका गणित बेहद आसान है। अगर हम जल संरक्षित नहीं कर रहे हैं, तो आज से ही इतनी बचत करना शुरू कर दें कि आने वाले 12-13 सालों में हम किसी अन्य जगह मकान ख़रीदने के पैसे जोड़ सकें। इसके साथ ही अपना कारोबार शिफ्ट करने या नई जगह नौकरी करने के लिए भी तैयार रहें।

क्योंकि जब अपना शहर नो वाटर ज़ोन में तब्दील हो जाएगा, तो हमारे पास सिवाए पलायन के और कोई चारा नहीं बचेगा। पानी की बर्बादी अगर इसी तरह जारी रही, तो हमें जमशेदपुर से बाहर खुद का नया आशियाना तलाशना होगा, या अपने रिश्तेदारों से आश्रय माँगना होगा। अब ये सब हमारे विवेक पर है कि हम पानी बचाते हैं, या पैसे जोड़-तोड़कर पलायन की तैयारी करते हैं, क्योंकि हम इंसान ये भूल रहे हैं, कि कुछ मामलों में हमारी ज़रूरतें मछलियों की तरह है। आसान से शब्दों में समझा जाए, तो हम वो इंसानी मछली है, जो पानी में तो नहीं रहते, लेकिन पानी के बिना जीवित भी नहीं रह सकती। इस पर्यावरण दिवस के मौके पर संकल्प लें कि हम हमारे आज से ही जल संरक्षण को लेकर सतर्क रहेंगे और लोगों को सजग करेंगे। ताकि हमारा शहर कंक्रीट के वीरान जंगल में तब्दील होने से बच जाए!

रिपोर्ट- Shweta Modi

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