कभी खेली थी लकड़ी से हॉकी, आज विदेशी स्टिक से करते हैं गोल


जमशेदपुर:- हॉकी देश के अन्य राज्यों और विदेशों में महज़ एक खेल होगा, लेकिन झारखण्ड के कई जिलों में हॉकी जूनून है, जज़्बा है। लोगों में हॉकी को लेकर दीवानगी इस हद तक है कि 5 साल के बच्चों से लेकर, 35 साल का युवा भी इसे हर रोज़ घंटों खेलते हुए अपना वक़्त गुज़ारता है। बेशक़ एक 5 साल का बच्चा, इस खेल की तकनीक और बारीकियों से इत्तेफ़ाक न रखता हो, लेकिन झारखण्ड के कई जिलों में इसकी तूती बोलती है। घर-परिवार में बच्चों को बचपन से ही लुक्कम-छुपी और पकड़म-पकड़ाई न सिखाकर हॉकी स्टिक थमा दी जाती है।

झारखण्ड के सुदूर इलाकों में जहाँ जीविका का प्रमुख माध्यम खेती-बाड़ी है, वहां हाथों में, महंगे हॉकी स्टिक की कल्पना नहीं की जा सकती। ग्रामीणों इलाकों में खेले जाने वाले इस खेल के लिए हॉकी स्टिक न तो विदेशों से मंगवाए जाते हैं, न ही स्पोर्ट्स शोरूम से ख़रीदे जाते हैं। बल्कि ये स्टिक बनाए जाते हैं, लकड़ियों को काटकर। और ग्रामीणों के लिए टर्फ होता है, इनके घर, स्कूल, हॉस्टल के आसपास मौजूद ऊबड़खाबड़ खाली जगह, जिसे मैदान के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।

प्रदेश के कई हॉकी प्लेयर्स ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर देश और राज्य का मान बढ़ाया है और सबसे सुकून भरी बात ये है कि झारखण्ड में अन्य खनिजों की तरह ही हॉकी के उम्दा प्लेयर्स मौजूद है, जो अभी पत्थर और पहाड़ों से नज़र आते हैं। उन्हें ज़रूरत है, किसी तराशने वाले कि जो उनकी प्रतिभा को मूर्ति का रूप दे सके। सुदूर इलाकों में मौजूद, इन प्रतिभाओं को तराशने का काम शुरू किया है, जमशेदपुर स्थित नवल टाटा हॉकी अकादमी ने।

इस अकादमी का उद्घाटन हुए अभी कुछ महीने ही बीते हैं। अकादमी का संचालन टाटा ट्रस्ट और टाटा स्टील मिलकर करती है। बीते महीनों में, अकादमी ने झारखण्ड के पश्चिमी सिंहभूम, खूंटी और सिमडेगा जिलों में बच्चों के बीच हॉकी का मैच आयोजित करवाकर कुल 3 हज़ार बच्चों में से, 28 बच्चों को चुना, जिनकी ट्रेनिंग अब नवल टाटा हॉकी अकादमी में चल रही है। इन बच्चों की ज़िंदगी पहले की तुलना में अब काफी बदल चुकी है।

टीम जमशेदपुरटेन्मेंट से बात करते हुए, नवल टाटा हॉकी अकादमी में रह रहे, खूंटी जिले के जिलिंगकेला गांव से आये 17 वर्षीय बिरसा मुंडू ने बताया कि वे पांच साल की उम्र से हॉकी खेल रहे हैं। उनके गांव में ज़्यादातर लोग हॉकी खेलते हैं। बिरसा कहते हैं, जब मैं काफी छोटा था, तभी मेरे पिता सानू मुंडू ने मुझे रबड़ की स्टिक और गेंद थमा दी थी। गांव और अकादमी के खेल में कितना अंतर है, पूछने पर बिरसा ने कहा, गांव में हम बिना किसी सुविधा के खेलते थे। मैदान में हॉकी खेलना खुली जगह में साइकिल चलाने जैसा है। जहाँ कोई दायरा तय नहीं है, जिधर मर्ज़ी, बॉल उधर घुमा लो। लेकिन अब हम टर्फ पर खेलते हैं, तो समझते हैं कि गांव और अकादमी के खेल में ज़मीन आसमान का फर्क है। वो मानते हैं कि पढ़ाई और खेल दोनों हमारे दोनों हाथों की तरह है, दोनों का बराबर महत्व है।

बिरसा मुंडू

खूंटी के ही तिरला गांव से अकादमी पहुंचे 14 वर्षीय सुखनाथ गुरिया अपना अनुभव साझा करते हुए कहते हैं, मैं छह-सात साल की उम्र से हॉकी खेल रहा हूँ। इसमें मेरे पिता सुखराम गुरिया का विशेष योगदान है। गांव में हम सभी सुबह जल्दी उठकर हॉकी खेलने जाते थे, फिर शाम को, स्कूल से लौटकर भी घण्टों हॉकी खेला करते थे। एक बार मुझे पता चला कि खूँटी में हॉकी का ट्रायल चल रहा है। वहां मैं भी पहुँच गया और ट्रायल के दौरान मेरा चयन इस अकादमी के लिए हो गया। कोच के साथ खिलाड़ियों के रिश्तों पर बात करते हुए सुखनाथ ने बताया, यहाँ अकादमी में सब बहुत अच्छे हैं। कोच हमपर किसी भी तरह का दबाव नहीं डालते हैं। बस हमारी कमियों को चिन्हित करते हैं, ताकि हम अपने खेल में सुधार ला सकें। गांव में हमें खेल सिखाने वाले कोच, हमारी गलतियों पर नाराज़ होते थे, लेकिन अकादमी में ऐसा नहीं होता। यहाँ आकर मुझे लगता है कि मैं आगे चलकर राष्ट्रीय टीम का हिस्सा बन सकता हूँ।

सुखनाथ गुरिया

इसी जिले के केवरा गांव के निवासी 16 वर्षीय लाडूरा हस्सापूर्ति ने भी जमशेदपुरटेन्मेंट से खुलकर बात की। आषव पान के बेटे लाडूरा ने कहा कि हॉकी में मेरी दिलचस्पी हमेशा से रही है। ये एक ऐसा खेल है, जिसे देखते हुए हम बड़े हुए हैं। शुरुआत के समय में मुझे हॉकी खेलना बहुत पसन्द था। लेकिन एक बार हमारी टीम में गोलकीपर की गैर मौजूदगी से पूरी टीम निराश थी। इस दिन हमारा मैच होना था, लेकिन बिना गोलकीपर ये मुमकिन न था। कोई भी खिलाड़ी गोलकीपर बनने को तैयार नहीं था। इसलिए मैंने गोलकीपर बनने का फैसला किया। उस मैच में मुझे बेस्ट प्लेयर का ख़िताब दिया गया। वो एक दिन था, और आज का एक दिन है। इस अकादमी में मैं मैच के दौरान गोलकीपिंग करता हूँ और सभी मुझे इसकी बारीकियां सिखाते हैं।

लाडूरा हस्सापूर्ति

इन किशोरों की बातें, कई मोड़ पर हमें हैरान करती रही, तो कई बार इनकी सीधी-सपाट बातों ने हमारे चेहरे पर मुस्कान बिखेर दी। आज इन सभी के परिवार वाले इनके खेल और साथ में मिल रहे शिक्षा और बेहतर जीवन को देखकर काफी खुश हैं। वो मानते हैं कि महज़ खेती करके वो अपने बच्चों को ऐसी सुविधाएं कभी नहीं दे सकते, जैसी इन खिलाड़ियों को नवल टाटा हॉकी स्टेडियम में मिल रही है। अब इन सभी किशोरों का परिवार इस उम्मीद में हैं कि एक दिन उनके बच्चे राष्ट्रीय टीम का हिस्सा होंगे और अपने अदभुत खेल से भारत का नाम, हॉकी के खेल में एक स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा।

जमशेदपुर मना रहा है “खेल उत्सव”, जमशेदपुर वासियों के लिए सुनहरा मौका

सर दोराबजी टाटा के जन्मदिन की 159वीं वर्षगांठ पर जमशेदपुर में “खेल उत्सव” का आयोजन किया जा रहा है। रविवार, 26 अगस्त 2018 को लोयला विद्यालय, साकची स्थित फेसी ऑडोटोरियम में शाम 6:30 बजे से “अ सेलिब्रेशन ऑफ स्पोर्ट्स” कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। कार्यक्रम में अंतराष्ट्रीय हॉकी लीजेंड रिक चार्ल्सवर्थ एवम ज़फर इकबाल कार्यक्रम के मुख्य आकर्षण होंगे। रिक चार्ल्सवर्थ हॉकी आस्ट्रेलिया से है, वह ओलंपिक रजत पदक विजेता है। वही जफर इकबाल स्वर्ण पदक विजेता है, उन्हें पदमश्री, अर्जुन अवार्ड से भी नवाजा गया है।
जमशेदपुरवासियों के पास कार्यक्रम में शिरक़त
कर हॉकी लीजेंड्स से मिलकर हॉकी को जानने का सुनहरा मौका है। प्रसिद्ध खेल पत्रकार व लेखक बोरिया मजूमदार कार्यक्रम के दौरान लीजेंड्स से बातचीत करेंगे।

*आप सभी जमशेदपुरटेंमेंट के फेसबुक पेज पर चलाये जा रहे कांटेस्ट में आसान सवालों का जबाब देकर 200 लोग कार्यक्रम में शिरकत करने का मौका पा सकते है।*

रिपोर्ट : श्वेता मोदी,तरुण कुमार
तस्वीरें : Aevikr

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