इसलिए खास है मेरे शहर का दुर्गा पूजा


जमशेदपुर:-अपने शहर जमशेदपुर में हर त्यौहार बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है। एक जमशेदपुरिया के लिए किसी भी पर्व-त्यौहार में अपने शहर से दूर रहना उतना ही मुश्किल है, जितना खुद को सम्बोधित करने में, “हम “की जगह “मैं” शब्द का इस्तेमाल करना। लेकिन बात अगर दुर्गा पूजा की हो, तो इस शहर के लोग धरती के जिस कोने में रहेंगे, उस कोने में उन्हें जमशेदपुर के दुर्गा पूजा की याद सताएगी।

पूरे भारत में और विश्वभर में, माँ दुर्गा के आगमन को शारदीय नवरात्र के तौर पर जाना जाता है, लेकिन झारखण्ड, बिहार, बंगाल और ओडिशा के लिए, ये दुर्गा पूजा है। नवरात्री सभी के लिए साल में दो बार आती है, लेकिन हम चैत्र में नवरात्रि और आश्विन के महीने में दुर्गा पूजा मनाते हैं। दुर्गा पूजा आने से महीने भर पहले बाज़ारों में उमड़ी भीड़ इस बात का सबूत होते हैं कि यह त्यौहार हमारे लिए कितना ख़ास है। षष्टी, सप्तमी, अष्टमी और नवमी हर दिन के लिए अगर एक नया कपड़ा न लिया, तो फिर हमने दुर्गा पूजा की तैयारी ही क्या की!

इस मौके पर पूरे शहर की आबादी सड़कों पर नज़र आती है। गाड़ियों की लंबी कतार ये बताने को काफी होती है, कि भईया हमारे शहर वाले बड़े घुम्मकड़ किस्म के हैं। रात-रात भर पूजा पंडाल घूमते हुए इस त्यौहार को मनाना, हम जमशेदपुरियों का सबसे पसंदीदा तरीका है दुर्गा पूजा मनाने का। उसपर जगह-जगह पर लगने वाले मेले और वहां मौजूद चाट,गोलगप्पे और डोसे के ठेले। ये नज़ारा सिवाए जमशेदपुर के कहीं और नहीं मिलेगा।

हर एक से डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर बने पंडाल ये बताते हैं कि शहर में केवल एक विशेष समुदाय ही नहीं, बल्कि पूरा शहर माँ दुर्गा के आगमन का आनंद लेते हैं। अक्सर लोग अपने ख़ास रिश्तेदारों और दोस्तों को शादी-ब्याह जैसे मौकों पर घर आने का निमन्त्रण देते हैं, लेकिन हम जमशेदपुरिया इस मामले में ज़रा अलग है। हम अपने करीबी लोगों को दुर्गा पूजा के अवसर पर अपने शहर बुलाते हैं, ताकि वो भी देख सकें कि क्यों हम जमशेदपुर दुर्गा पूजा के नाम भर से खिल जाते हैं।

दुर्गा पूजा में अक्सर घूमते-फिरते हमारा उनलोगों से मिलना हो जाता है, जिनके साथ हम कभी स्कूल-कॉलेज में पढ़ा करते थे, लेकिन शहर छूटने के बाद उनसे हर तरह का सम्पर्क टूट गया हो। ये एक ऐसा मौका होता है, जब पूरा शहर ही मेले का रूप ले लेता है। कहीं कोई ऐसी जगह नहीं बचती, जहाँ लाइटिंग और साज-सज्जा न की गई हो। इस तरह से जश्न में डूबे लोग, जमशेदपुर के अलावा और कहीं नहीं पाए जातें!

रौनक का आलम ये होता है कि शहर की सड़कों और पंडालों में तो भीड़ होती ही है, लेकिन रेस्टोरेंट के बाहर भी लोग लाइन लगकर अपना नंबर आने का इंतज़ार करते देखे जाते हैं। सप्तमी,अष्टमी और नवमी, ये तीन दिन ऐसे होते हैं कि शायद ही किसी घर में माता का भोग न पहुंचे। बाकि शहरों में भोग के नाम पर पूड़ी-सब्ज़ी मिलती है, लेकिन हमारे शहर में भोग का पर्याय ही है खिचड़ी। जो माता के भोग लगने से हज़ार गुना ज़्यादा स्वादिष्ठ हो जाता है। ढाक के ताल पर थिरकने में भी यहाँ के लोगों का जवाब नहीं।

परिवार के साथ घूमने-फिरने में, माँ की आराधना करने में और लज़ीज़ व्यंजनों का स्वाद लेने में, कब नवरात्रि के दिन निकलते जाते हैं, इसका पता ही नहीं चलता। दशमी के दिन होने वाले सिन्दूर खेला का भी अलग आनंद होता है। जहाँ महिलाएं एक-दूसरे के गाल और मांग पर माँ के नाम का सिन्दूर लगाती हैं। दशमी के ही दिन शाम को निकलने वाले जुलूस को देखने के लिए हज़ारों की संख्या में लोग जिस तरह साक्ची गोलचक्कर पर इक्कठे होकर सौहार्द की मिसाल देते हैं, वो भी काबिले तारीफ़ है।

एक जमशेदपुरिया इन तमाम बातों को खुद से जोड़ते हुए, न जाने कितनी ही यादों को ताज़ा कर लेगा। अगर अबतक उसने दुर्गा पूजा में किसी मज़बूरी के कारण, शहर आने का मन न बनाया हो, तो इस लेख को पढ़कर शायद उसे शहर न लौटने का मलाल ज़रूर होगा। और कोई शख़्स, जो यहाँ का निवासी न हो, अगर उसने इसे पढ़ा, तो एक बार वो हमारे शहर ज़रूर आना चाहेगा। बाकि ये तो बस हमें ही पता है कि अगर किसी ने एक बार भी हमारे यहाँ की दुर्गा पूजा देख ली, तो हर साल वो इसे याद करते हुए गुज़ारेगा!

Report- Shweta Modi

One thought on “इसलिए खास है मेरे शहर का दुर्गा पूजा

  1. Excellent, we take full pleasure
    Of Puja in any condition. This year whether is different but, it
    make no difference, this period is for planning.
    All the best for puja

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