क्या MGM स्वच्छ भारत अभियान का ब्रांड एंबेसडर बन सकता है


जमशेदपुर:- अस्पताल एक भयावह जगह है। यहाँ एक पल ख़ुशी के और सौ पल दर्द के देखने को मिलते हैं। मैं हमेशा से अस्पताल और दवाईयों से दूरी बनाए रखने की कोशिश करती हूँ। किसी को अस्पताल मिलने जाने का ख्याल भी मुझे विचलित कर देता है। उसपर भी अगर बात सरकारी अस्पताल की हो, तो मन में दहशत कई गुना बढ़ जाता है।

हमारे जिले का एकमात्र सबसे बडे सरकारी अस्पताल बीते 15 दिनों में अबतक दो बार मेरा स्वागत कर चुका है। जब हम किसी शख़्स से मिलते हैं, तो पहली बार के मुकाबले दूसरी मुलाकात में हम उसे ज़्यादा बेहतर तरीके से जान पाते हैं! इस अस्पताल के साथ भी कुछ ऐसा ही है। महात्मा गांधी मेमोरियल अस्पताल ने दूसरी बार मुझे घंटों अपने परिसर के चक्कर लगवाए और अब, अस्पताल का लगभग हिस्सा मैं घूम चुकी हूँ।

बचपन से सुनती आई हूँ, भगवान अस्पताल का मुँह कभी न दिखाए। क्यों न दिखाए, आज सबसे करीब से जान पाई हूँ। यहाँ होती घटनाओं को देखते हुए लगता है, हमें ऐसे किसी प्रतीकात्मक चीज़ की ज़रूरत नहीं है, जो भारत को सुर्ख़ियों में लाए, क्योंकि ऐसी तरक्की स्वास्थ सुविधाओं की पूरक नहीं है। अब, स्वास्थ्य साधनों से समझौता नामंज़ूर होना चाहिए। केवल सत्ता या विपक्ष के तौर पर ही नहीं, बल्कि एक आम इंसान के नाते भी हमें इस समझौते का बहिष्कार करना चाहिए। सालों से ऐसा चलता आ रहा है और सदियों तक इस व्यवस्था को बदला नहीं जा सकता, ये मानसिकता हमारे कमज़ोर मनोबल को दर्शाती है।

मेरे शहर की ही ख़बर है। एक 39 वर्षीय युवक सरकारी अस्पताल में अपना इलाज करा रहा था। इसी दौरान रात के समय वो पानी पीने के लिए अस्पताल के नल तक पहुंचकर नल खोलता है, लेकिन वहीं बेसुध होकर गिर पड़ता है। पूरी रात उसकी ख़बर लेने, वहां कोई नहीं आया। सुबह वो युवक, एक लाश में तब्दील हो चुका था। बात यहीं ख़त्म नहीं होती। बल्कि सुबह होने तक, उस मृत युवक के हाथ – पैर चूहों ने कुतर डाले!

इस ख़बर ने मुझे हैरत में डाल दिया। क्या हमने सचमुच इतने बुरे कर्म किए हैं, कि ज़िंदगी भर चलने वाला संघर्ष मौत के दरवाज़े पर भी हमारा मखौल उड़ाकर चला जाए? और हम इसे महज़ लचर व्यवस्था और उससे बढ़कर, अपने लिए ख़बर भर समझकर चाय की चुस्की के साथ इसे गटक लें? तमाम सवालों के भूल-भुलैया का जवाब, स्वास्थ व्यवस्था में बदलाव का दरवाज़ा ही है।

रिपोर्ट- श्वेता मोदी

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