क्या हुआ जब जमशेदपुर की एक लड़की संसद भवन पहुंची ?


हर किसी के लिए किसी ऐसी जगह जिसे उन्होंने अक्सर टेलीविज़न पर देखा हो वहां जाना एक सपने की तरह ही होता है और क्या हुआ जब हमारी लेखिका श्वेता मोदी को ये मौका मिला और उन्होंने बड़े खूबसूरत तरीके से अपने संसद जाने के अनुभव को शब्दों में पिरोया लीजिये पढ़िए और अनुभव कीजिये

कल संसद जाना है। इस ख़ुशी में पूरी रात करवट बदलते हुए गुज़री। और फिर अलार्म बज उठा। हर दिन अलार्म सुबह 5 बजे ही बजता है, लेकिन आज की बात ही कुछ और है। आज अलार्म बजने के बाद भी सोने के लिए थोड़ा समय है, लेकिन नींद नहीं।

थोड़ी देर करवटें बदलते हुए आख़िरकार उठ गई। बार-बार ख़्याल आते रहे, कैसा होता है संसद में सबकुछ? परिसर, सदन, बहस। नेताओं को टीवी पर ही देखा है, लेकिन आज सबकुछ देखने का उत्साह मैंने अपने चेहरे पर आईने की मदद से देखी। नौ बजे पहुंचकर संसद में एंट्री के लिए पास लेना है और मैं 6:50 में घर से निकल गई। कुल – मिलाकर 8: 15 बजे, मैं केंद्रीय सचिवालय मेट्रो स्टेशन पर साथियों के इंतज़ार में हूँ।

नार्थ एवेन्यू पहुंचकर, सांसद महोदय के घर से एंट्री पास लेते हुए, दो किलोमीटर चलते – फिरते छावनी बने संसद के गेट नंबर आठ पर जा पहुंची। यहाँ से मेरा हर बढ़ता कदम मानो एक मंज़िल के करीब बढ़ रहा है। सोच रही हूँ, पता नहीं जल्दी पहुंचकर आगे बैठना होगा भी या नहीं! उसपर पहले आओ पहले पाओ वाली बात सुनते ही सोचने लगी भगवान! मुझपर तरस खाना। अब मैं गेट नंबर आठ से प्रवेश कर रही हूँ।

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सिक्योरिटी की पहली परत को पार करते हुए अब रिसेप्शन में पहुंचकर मैं भी पंक्ति का हिस्सा हूँ। 12 बजे से 1 बजे तक संसद के दर्शक दीर्घा में बैठने का समय मेरे पास पर कायदे से प्रिंट किया हुआ है।

ये जानने के बावजूद मुझे चुपचाप एक जगह बैठना गवारा नही है। अगर एंट्री मिलती है, तो रिसेप्शन में बैठने के बजाय मैं परिसर और वहां मौजूद लोगों को देखना चाहूंगी। सिक्योरिटी के दूसरे चरण को पार कर पाती, इसके पहले ही मुझे बता दिया गया मेरी एंट्री 11:30 पर होगी।

अब, बैठना और इंतज़ार करना मेरी मज़बूरी है। लेकिन इस समय को भी मैं गंवाना नहीं चाहती। इसलिए रिसेप्शन पर मौजूद लोगों से बात करने की सोच, चुपचाप साथियों के बीच से खिसक गई। आज ही ट्रिपल तलाक़ पर राज्यसभा में बहस होनी है। काश! आज ही राज्यसभा में मेरा भी जाना हो जाए। यही सोचकर मैं जुगाड़ तलाशने के लिए भटक रही हूँ। ऐसा कोई जुगाड़ नहीं मिला। लेकिन जो मिला वो हैरान करने वाला है।

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राज्यसभा जाने में मेरी दिलचस्पी ने मेरी ज़ुबान में तेज़ी ला दी। क्या,कब, कैसे, किस प्रक्रिया से मैं आज ही राज्यसभा भी पहुँच जाऊं। इस उत्साह ने उस अधेड़ शख्स के सामने सवालों की झड़ी लगा दी।

अधेड़ महोदय मेरी बात सुनते रहे, फिर कहा, “हाँ, मैं करवा दूंगा। जब आना हो मुझे फ़ोन कर देना, हमारे जानने वालों को दिक्कत नहीं होती है। मेरे चेहरे की मुस्कान खिलने को हुई और तपाक से मेरी हंसी के बीच में अधेड़ पूछ बैठा, क्या आप शादी-शुदा है?” नहीं सर का जवाब सुनते ही उसकी ज़ुबान कैंचीे सी चल पड़ी।

फिर भी मेरे शक की सुई उस अधेड़ के इरादे पर नहीं ठहरी। मैं अब भी लगातार बातों में मग्न हूँ। “सर अगली बार मुझे राज्यसभा आना हो तो मैं आपसे सम्पर्क करूंगी। आप अपना नंबर मुझे दे दीजिए। “वैसे मुझे आज ट्रिपल तलाक़ पर होने वाले बहस को देखने की काफी इच्छा है। एक पत्रकार होने के नाते मैं इसे देखना चाहती हूँ।”

इतना सब कहने के बाद मैं उस अधेड़ का जवाब सुनने को शांत हो गई। महोदय ने कहा, “बिलकुल अगली बार आप आओ तो मैं लेटर में लिख दूंगा आप मेरी फ्रेंड हो या “गर्लफ्रेंड हो”। देखो,कुछ तो कहना पड़ेगा ना! अधेड़ अब भी बोलता जा रहा है। अपनी सफाई में उसने कहा, मुझे भी जवाब देना पड़ता है कि आप मेरी कौन हो, क्या हो।” उसकी “गर्लफ्रेंड” वाली बात ने मुझे अंदर तक हिला दिया।

मैंने बस जवाब में कहा, मैं आज अकेले नहीं आई हूँ, न ही कभी अकेले आना चाहती हूँ। इसके बाद बिना बात को आगे बढ़ाए मैं वहां से निकल आई। लौटकर अपने साथियों को इस घटना की जानकारी देते हुए एक पर्ची मैंने अपने साथी पर दे मारा। इस पर्ची में उस अधेड़ का नंबर है, जो अब मेरे किसी काम की नहीं है।

मेरी गलती पर मुझे ज्ञान मिलने वाला है और मैं इसके लिए तैयार हूँ। किससे कितनी बात करनी है, इस मुद्दे पर दोस्तों से थोड़ी देर ज्ञान मिलता रहा और 11:15 हो गए। चलो लाइन में लगते है, समय हो रहा है मैंने कहा। अब हम सब लाइन में है, लेकिन मैं अभी – अभी संसद के रिसेप्शन में हुई इस घटना के बारे में सोच रही हूँ।

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लगभग 15 मिनट तक पंक्ति में टिके रहने के बाद हमने सिक्योरिटी का दूसरे स्तर पर भी फ़तह हासिल की। प्रवेश करते ही “लोकतंत्र का मंदिर -संसद” यह बात मैं बुदबुदाने लगी। सचमुच कितना ख़ास है यह परिसर। मीडिया और जवानों से पटा, कुछ नेताओं की आती – जाती गाड़ियां और पहली बार संसद पहुंची नई – नई पत्रकार।

वहां हर चीज़ पर अपनी नज़र दौड़ाने की मेरी ख़्वाहिश। कुछ छूट ना जाए। कौन क्या कर रहा है, देखना मेरे लिए काफी ज़रूरी है, क्योंकि ऑफिस से छुट्टी लेने के बावजूद आज मैं काम कर रही हूँ। संसद परिसर में अपने लिए रिपोर्टिंग का काम। तमाम चेकिंग से गुज़रते हुए एक आईडी कार्ड और कागज़ के नोटों को जेब में भरकर 12 बजे की जगह दर्शक दीर्घा में मैं 12:20 तक पहुँच पाई।

चेकिंग इतनी पेंचीदा रही कि तय समय से 20 मिनट अतिरिक्त उसी में निकल गए। इसका अफ़सोस मुझे सदन में दर्शक बनकर पहुँचने तक होता रहा। निर्देशानुसार मैं अपने साथियों से अलग एक सीट पर जाकर बैठ गई। गनीमत रही कि मुझे पहली पंक्ति में जगह मिली। वरना ना चाहते हुए अपने कद को कोसना पड़ता। सदन में बहस जारी है।

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मालिकार्जुन खड़गे हाथों में कुछ कागज़ पकड़े दलितों की बात कर रहे हैं। महाराष्ट्र की घटना लोकसभा का मुद्दा बनकर बहस के रूप में जारी है। मेरे बगल में बैठा संसद में कार्यरत वह शख्स बड़े मन से अपनी ड्यूटी कर रहा है। मैं गर्दन उठाकर दर्शक दीर्घा से नीचे, सदन में झाँकने की कोशिश करती, तो वो इशारा कर मुझे ऐसा
करने से मना कर देता।

मोदी सदन में आओ। विपक्ष लगातार यह नारे लगा रही है। पक्ष वाले भी अपनी बहुमत का बोध करा रहे हैं, लगातार शोर मचाकर। विपक्ष के नेताओं के बीच से आवाज़ आई। “महोदया सदन में हमारा भी अधिकार है।” मोदी को सदन में बुलाने की मांग बढ़ती जा रही है और अब वह मांग अध्यक्ष महोदया की कुर्सी के पास विपक्ष के नेताओं के तौर पर खड़ी है। अब सदन 12:45 तक के लिए स्थगित कर दी गई। सदन स्थगित होते ही मेरा मन सवालों और तकलीफों से भर गया।

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सदन में जिन उम्मीदों से हम अपने प्रतिनिधि को भेजते है, मेरे सामने उसकी धज्जियाँ उड़ रही है। हर क्षेत्र की अपनी अलग समस्याएं है। लेकिन सदन में राष्ट्रीय मुद्दों की बहस या यों कहें, अपनी पार्टी के राजनीतिक हितों को साधने की होड़ मची है।

कोई जनप्रतिनिधि अपनी बात रखना चाहता, तो सदन का शोर उसकी आवाज़ दबा देता। कौन कहता है कि देश में सिर्फ किसी ख़ास वर्ग की आवाज़ दबती है? संसद में भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच निर्दलीय या छोटी पार्टियों के सांसदों की आवाज़ घुटती है।

कुछेक की आवाज़ें मेरे सामने दब रही हैं। कभी शोर के कारण, तो कभी अध्यक्ष महोदया के “आप बैठ जाइए के कारण”। और अब कई सवालों के साथ लौट रही हूँ “लोकतंत्र के मंदिर से”।

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लेखिका श्वेता मोदी के फेसबुक वाल से

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