जब टाटा स्टील को छोड़कर जमशेदपुर के सभी कंपनी 48 दिन के लिए थे बंद : टाटा वर्कर्स यूनियन और 100 साल


27 अगस्त 1907 मे टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी के नाम पंजीयन हुआ। 27 फरवरी 1908 को कारखाना बनाने का काम चालू हुआ।
16 फरवरी 1912 को इस्पात की पहली सिल्ली बन कर दुनिया के सामने आई।
2 जनवरी 1919 को इस शहर का नाम साकची से जमशेदपुर और कालीमाटी स्टेशन से टाटानगर रेलवे स्टेशन रखा गया।

*कैसे हुआ टाटा वर्कर्स यूनियन का जन्म*

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद महंगाई चरम सीमा पर थी और मजदूरों में आक्रोश था, तब हमारा देश गुलाम हुआ करता था और यहां के जितने भी अफसर थे ज्यादातर अंग्रेज हुआकरते थे।
यहां के श्रमिकों के बीच आपसी भाईचारा तो तथा लेकिन कंपनी के एक जनरल मैनेजर थे जिन के तानाशाही के कारण श्रमिकों में आक्रोश हुआ, उस समय के अधिकतर मजदूर अशिक्षित हुआ करते थे। उनमें से कुछ तेजतर्रार मजदूरों ने एक मांग पत्र दिया और 1 माह के भीतर कुछ ना होने पर उन्होंने हड़ताल कर दिया यह हड़ताल नेतृत्वहीन था।

उसके बाद 5 मार्च 1920 को, आज से ठीक 100 साल पहले शाम के करीब 5:00 बजे कम्पनी मे एक आम बैठक बुलाई गई और वहां से एक यूनियन का जन्म हुआ जिसका नाम रखा गया *जमशेदपुर लेबर एसोसिएशन*

इस एसोसिएशन के प्रथम अध्यक्ष *एस एच हलदर* हुए।

उनके नेतृत्व में हड़ताल जारी रहा 15 मार्च 1920 को शांतिपूर्ण तरीके से हड़ताल चल रही थी, तभी कुछ घुड़सवार पुलिस अफसर ने मजदूरों पर गोली चलाई जिसमें 5 श्रमिक शहीद हो गए।

इस घटना की जानकारी मिलते ही तत्कालीन चेयरमैन सर दोराबजी टाटा जमशेदपुर पहुंचे। 19 मार्च 1920 को एक समझौता हुआ और 20 मार्च 1920 को सभी श्रमिक अपने काम पर वापस लौट गए। उस समझौते में श्रमिकों की 20 से 45% तक वेतन में बढ़ोतरी हुई, पीएफ और हेल्थ तक के कई विषयों पर श्रमिक हित में यह समझौता किया गया।

1924 के शुरुआती दिनों में ही श्री हलदर की तबीयत खराब होने के कारण उन्होंने जमशेदपुर लेबर एसोसिएशन से विदाई ली। अब कमान सी एफ एंड्रयूज के हाथों में थी, उन्होंने प्रबंधन और एसोसिएशन के बीच यथासंभव साझेदारी कर कंपनी को आगे बढ़ाने का काम किया।

7 अगस्त 1925 को श्री महात्मा गांधी जी का जमशेदपुर आगमन हुआ जहां उन्होंने जमशेदपुर लेबर एसोसिएशन के लोगों को संबोधित भी किया। अपने व्यस्तता होने के कारण श्री एंड्रयू को 1928 में जमशेदपुर लेबर एसोसिएशन छोड़ना पड़ा।

*नेताजी सुभाष चंद्र बोस का योगदान*

फिर से विभागीय हड़ताल का सिलसिला शुरू हो गया।
एक बड़ा हड़ताल जिसका कोई नेतृत्व नहीं कर रहा था, तब श्रमिकों ने कलकत्ता जाकर उभरते हुए क्रांतिकारी नेता नेताजी सुभाष चंद्र बोस से मुलाकात की।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस यहां की वास्तविक स्थिति समझने के बाद 18 अगस्त 1928 को जमशेदपुर आए और 20 अगस्त 1928 को उन्हें जमशेदपुर लेबर एसोसिएशन का तीसरा अध्यक्ष चुना गया।

उनके नेतृत्व में प्रबंधन से सकारात्मक बातचीत हुई उस वक्त सबसे बड़ी हड़ताल हुइ जो 3 महीने 18 दिन चली।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस और तत्कालीन चेयरमैन के बीच कुछ अहम फैसले हुए और 12 सितंबर 1928 को हड़ताल खत्म कर दिया गया
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 1928 से लेकर 1936 के बीच अपने कार्यकाल में प्रबंधन और श्रमिकों के बीच ऐसा मार्गदर्शन दिया जिसके कारण वह यूनियन के इतिहास का आखरी हड़ताल रहा।
स्वतंत्रता की लड़ाई में उनकी भागीदारी इतनी बढ़ गई, उन्होंने जमशेदपुर लेबर एसोसिएशन का अध्यक्ष किसी और को बनाने की अपील की।

*टाटा वर्कर यूनियन नामकरण*

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जाने के बाद महात्मा गांधी को डर था कि कहीं श्रमिकों का नेतृत्व गलत हाथों में ना पड़ जाए। इसकी वजह से उन्होंने प्रोफेसर अब्दुल बारी से आग्रह किया कि वह जमशेदपुर लेबर एसोसिएशन की कमान अपने हाथों में ले, अब्दुल बारी ने उनकी बातों को समझ कर हामी भरी और इस तरह अब्दुल बारी जी जमशेदपुर लेबर एसोसिएशन के चौथे अध्यक्ष बने।

जमशेदपुर लेबर एसोसिएशन के अध्यक्ष बनने के बाद प्रोसेसर अब्दुल बारी ने इसका नया नाम टाटा वर्कर्स यूनियन रखा और सरकार के द्वारा इसे पंजीकृत भी कराया।

स्वतंत्रता की लड़ाई में भी टाटा वर्कर्स यूनियन ने अपनी अहम भागीदारी सुनिश्चित की आजादी से 5 माह पूर्व रेलवे स्टेशन जाने के क्रम में श्रमिकों के मसीहा प्रोफेसर अब्दुल बारी जी की हत्या कर दी गई

1956 में यूनियन के अध्यक्ष श्री माइकल जॉन और तत्कालीन चेयरमैन श्री जे आर डी टाटा के बीच कुछ अहम समझौते हुए जो श्रमिक इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ

यह सुनिश्चित करना के यूनियन एकमात्र यूनियन कंपनी के अंदर रहेगी अहम फैसले रहे

*जब टाटा स्टील को छोड़कर जमशेदपुर के सभी कंपनी 48 दिन के लिए थे बंद*

1968 में राजनीतिक पार्टी की आवाज में जब जमशेदपुर सुलग रहा था और जमशेदपुर के सभी कंपनी में ताला लग गया था तब टाटा स्टील एकमात्र ऐसी कंपनी थी जिसमें श्रमिक काम कर रहे थे पूरे जमशेदपुर में सभी कंपनियों पर 48 दिन तक ताला लग रहा लेकिन टाटा स्टील और उसके यूनियन इतनी मजबूत थी कि 48 सेकेंड के लिए भी ताला नहीं लगा।

*सर दोराबजी टाटा ने क्या किया जब उनके पास मजदूरों को तनख्वाह देने के पैसे नहीं थे*

सर दोराबजी टाटा 1904 से 1932 तक उनका कार्यकाल रहा और अपने कार्यकाल में उन्होंने काफी उतार-चढ़ाव भी देखें।
कंपनी अपने खराब वक्त से गुजर रही थी और एक वक्त ऐसा आ गया था जब सर दोराबजी टाटा के पास मजदूरों के तनख्वाह देने के भी पैसे नहीं बचे थे ।
लेकिन उनकी सोच हमेशा से थी कि वह बाद में है पहले उनके साथ काम करने वाले लोग हैं।
तब उन्होंने अपने बीवी के जेवर को बंधक रखकर कुछ जेवरो को बेचकर उन्होंने मजदूरों की तनख्वाह दी थी।

*जब टाटा स्टील के मजदूरों ने आधा तनख्वाह लेने का फैसला किया*

टाटा स्टील दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान काफी मुश्किलों का सामना कर रही थी तब टाटा स्टील के मजदूरों ने अपना हाथ खड़ा किया उन्होंने कहा कि कंपनी के इस मुश्किल घड़ी में भी वह कंपनी के साथ है और जब तक कंपनी के हालात सुधर नहीं जाते वह कंपनी से आधे तनख्वाह में भी पूरा काम करेंगे

*100 साल के इतिहास में मात्र 11 अध्यक्ष*

टाटा वर्कर्स यूनियन के 100 साल हो चुके हैं, लेकिन एक रोचक तथ्य यह भी है कि इतने बड़े कार्यकाल में मात्र 11 अध्यक्ष ही चुने गए हैं।

यह यूनियन और कंपनी दोनों की स्थिरता और शक्ति को दर्शाती है।

*निश्चित ही, टाटा टो टाटा है*

Written by tanweer ahsan

Report Jamshedpurtainment

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